शिवपुराण और देवी सन्ध्या: आध्यात्मिक महत्त्व

Written by satyug.in

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शिवपुराण, हिन्दू धर्म के महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है, जो भगवान शिव की अनगिनत लीलाएं, तात्पर्यग्रंथ है। इस ग्रंथ के एक अद्वितीय भाग में, भगवान शिव द्वारा दिव्य रहस्यों का वर्णन है, जो आत्मा के उच्चतम तत्त्वों को समझने में मदद करता है। इस आर्टिकल में, हम इस ग्रंथ की एक घटना “देवी सन्ध्या कथा” को विशेष रूप से विचार करेंगे।

देवी सन्ध्या कथा:

शिवपुराण के अनुसार, ब्रह्मा जी की पुत्री सन्ध्या नामक एक तपस्विनी थीं, जिन्होंने भगवान शिव से योग्य वर प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया। उन्होंने इच्छा की कि जन्म लेने वाले सभी प्राणियों का मन, काम, और भाव निर्मल रहे।

भगवान शिव ने उनकी इच्छा को पूरा करते हुए कहा कि सभी प्राणी चार अवस्थाओं को प्राप्त होते हैं – शैशव, कौमार, यौवन, और वृद्धावस्था। तीसरी अवस्था प्राप्त करने पर ही जीवन यात्रा कामभाव से युक्त होती है, जिससे देवी सन्ध्या ने सकामभाव की मर्यादा स्थापित कर दी।

सन्ध्या और महृषि मेधातिथि का संबंध:

देवी सन्ध्या ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार महृषि मेधातिथि के बारह वर्षों तक चलने वाले यज्ञ में अपना शरीर त्यागने का निर्णय किया। भगवान शिव के आशीर्वाद से उनका शरीर अग्नि में समर्पित हो गया और उनकी आत्मा सूर्यमण्डल में पहुँच गई।

इस घटना के साथ ही सन्ध्या का शरीर दो भागों में विभाजित हो गया, जिससे प्रातः सन्ध्या और सायं सन्ध्या का उत्पन्न होना हुआ। यहां उज्ज्वल होता है कि शिवपुराण में सन्ध्या कथा के माध्यम से हमें आत्मा के उच्चतम तत्त्वों की अद्भुतता का विवेचन मिलता है और धार्मिक आदर्शों का पालन करने का मार्ग प्रशिक्षित होता है।

यह आर्टिकल देवी सन्ध्या कथा के माध्यम से हमें आत्मा के उच्चतम तत्त्वों की अद्भुतता का विवेचन मिलता है और धार्मिक आदर्शों का पालन करने का मार्ग प्रशिक्षित होता है।

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