एक समय की बात है कहीं एक बहुत धनवान साहूकार रहा करता था। उसके पास खूब धन-संपत्ति थी। किन्तु उसकी कोई संतान नहीं थी। इस कारण वो हमेशा दुखी रहता था। वह शिव भक्त था और संतान प्राप्त करने की इच्छा से वह प्रत्येक सोमवार शिवजी की पूजा करता, व्रत रखता और सायंकाल को शिव मंदिर में जाकर दीपक जलाता। यही उसका नियम था। एक दिन ऐसे ही जब वो मंदिर में पूजा कर रहा था तो जैसे ही उसने माँ पार्वती के चरणों में पुष्प रखे माँ द्रवित हो उठी और भगवान शिव से बोली,
“भगवन! यह साहूकार आपका भक्त है कितनी श्रद्धा और विश्वास से आपका व्रत पूजन करता है। आप इसकी मनोकामना पूर्ण क्यों नहीं करते प्रभु।”
भगवान शिव बोले, “हे पार्वती! यह संसार कर्मक्षेत्र है। जिस प्रकार किसान वही फसल काटता जो उसने बीज बोया होता है। उसी प्रकार इस संसार में सबको वैसा ही फल मिलता है जैसा उनके कर्मों के अनुसार उन्हें मिलना होता है।”
किन्तु माँ पार्वती नहीं मानी। वो कहने लगी,
“आप भी कितने भोले हैं। यदि भक्त के इतनी भक्ति करने के बाद भी आप उसका दुःख दूर नहीं करेंगे तो कोई आपकी पूजा, आपके व्रत क्यों करेगा भला, बताईये तो ज़रा।”
सबकुछ जानने वाली जगत जननी माँ दुर्गा को इस प्रकार बात करते देख प्रभु मुस्कुराने लगे। माँ फिर से बोली,
“हे जगत के स्वामी! आपका भक्त तो केवल विनती ही कर सकता है। किन्तु आप तो सब कुछ कर सकते हैं। तो क्या आप उसके पाप कर्म मिटा कर उसे सुफल नहीं दे सकते। उस निरीह के दुःख दूर कीजिये प्रभु, उस निसंतान की गोद भर दीजिये महादेव।”
माँ पार्वती का ऐसा आग्रह सुनकर भोलेनाथ बोले,
“हे गौरां! इस साहूकार के भाग्य में पुत्र नहीं है, किन्तु फिर भी तुम्हारे कहने पर मैं इसे पुत्र का वर देता हूँ। किन्तु वह पुत्र केवल 12 वर्ष तक ही जीवित रह पायेगा।”
माता ने भी ऐसा खेल रचा कि मंदिर में उपस्थित साहूकार को ये सारी बात सुनाई दे गयी। अब उसने पुत्र प्राप्ति की बात सुन तो ली, किन्तु उसे प्रसन्नता नहीं हुई। वो पहले की ही तरह भगवान शिव का व्रत पूजन करता रहा। कुछ समय पश्चात् साहूकार की पत्नी गर्भवती हुई और दसवें महीने में उसने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। उसके घर में खूब खुशियाँ मनाई गई, किन्तु साहूकार जानता था कि उसकी आयु मात्र 12 वर्ष ही है। इसलिए वो चाहकर भी प्रसन्न न हो पाया और न ही उसने किसी को ये बात बताई।
जब उसका पुत्र 11 वर्ष का हुआ तो उसकी पत्नी बड़ी प्रसन्नता से पुत्र के विवाह के विषय में उससे बात करने लगी। वो अपने पुत्र का विवाह बड़ी धूमधाम से करना चाहती थी। किन्तु साहूकार ने उसे ये कहकर विवाह के लिए मना कर दिया कि वो अभी अपने पुत्र को शिक्षा प्राप्त करने के लिए काशी भेजना चाहता है। फिर साहूकार ने अपने साले अर्थात पुत्र के मामा को बुला लिया और उससे बहुत सारा धन देकर कहा,
“किसी कारणवश मैं स्वयं इसके साथ नहीं जा सकता। तुम्हें इसके साथ जाना है और एक बात का ध्यान अवश्य रहे कि रास्ते में जिस भी नगर गाँव से गुज़रो वहाँ यज्ञ और ब्राह्मणों को भोजन अवश्य करवाना।”
दोनों मामा भांजा घर से काशी के लिए निकल पड़े। रास्ते में वे यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन करवाते जा रहे थे। राह में वे एक नगर में पहुंचे, जहाँ एक राजा की बेटी का विवाह था और दूसरा राजा अपने बेटे के साथ बारात लेकर वहीं ठहरा हुआ था। उस राजा का बेटा एक आँख से काना था। उसके पिता को इस बात की बड़ी चिंता थी कि कहीं वर को देख कर कन्या के माता पिता विवाह से इंकार न कर दें। उस राजा ने जब साहूकार के पुत्र को देखा तो उसके मन में आया कि क्यों न बारात के द्वार पर स्वागत के समय इस लड़के को दूल्हा बना कर आगे खड़ा कर दूँ। ये बात जब दूल्हे के पिता ने साहूकार के बेटे तथा उसके मामा से की तो वे राज़ी हो गए। साहूकार के बेटे को घोड़ी पर चढ़ा कर दूल्हा बना कर वे बारात लेकर कन्या के घर पहुँच गए। सब कुछ अच्छे से हुआ। दूल्हे के पिता के मन में विचार आया कि क्यों न पूरा विवाह कार्य इसी लड़के से करवा लिया जाये।
ये बात उसने साहूकार के बेटे और उसके मामा से कही और कहा कि यदि वे फेरों और कन्यादान का कार्य भी करवा दें तो वो उन्हें और धन देगा। वे मान गए। विवाह कार्य अच्छे से संपन्न हो गया। अब लड़का अपने मामा के साथ जाने लगा तो उसने दुल्हन की चुनरी पर लिख दिया,
“तेरा विवाह राजा के बेटे से नहीं मुझसे हुआ है और राजा का बेटा एक आँख से काना है। तुझे राजा के बेटे के साथ भेजा जायेगा। और मैं काशी पढ़ने जा रहा हूँ।”
लड़के के जाने के बाद दुल्हन ने जब अपनी चुनरी पर ये लिखा हुआ पाया तो उसने ये बात अपने पिता से कह दी और कह दिया कि ये मेरा पति नहीं है मैं इसके साथ नहीं जाउंगी। मेरा पति काशी पढ़ने गया है। राजकुमारी के माता पिता ने उसे विदा नहीं किया और बारात वापिस चली गयी।
उधर काशी में साहूकार के बेटे ने शिक्षा ग्रहण करना शुरू कर दिया। वो और उसका मामा दोनों यज्ञ हवन भी करते रहते। जिस दिन लड़का 12 साल का हुआ उस दिन भी वे यज्ञ कर रहे थे, लड़का अपने मामा से बोला,
“मामा जी मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही।”
मामा ने कहा,
“तुम अंदर जाकर सो जाओ।”
लड़का अंदर जाकर सो गया। थोड़ी ही देर में जब उसका समय आया तो उसके प्राण निकल गए। थोड़ी देर में जब लड़के का मामा अंदर आया तो उसने देखा कि लड़का तो निर्जीव पड़ा है। वो परेशान हो गया। बाहर अभी हवन चल रहा था। उसने स्वयं को संभाला और पहले हवन कार्य को पूर्ण करने का निर्णय लिया। उसने यज्ञ का कार्य पूर्ण कर ब्राह्मणों को भोजन करवाया और उनके जाने के बाद फूट फूट कर रोने लगा। संयोगवश वहीं से गुज़रते माँ पार्वती और शिव शम्भू के कानों में उसके रोने की आवाज़ पड़ी। तो माँ ने कहा,
“हे जगदीश्वर अवश्य कोई दुःख में है। कृपया उसका दुःख दूर करें।”
महादेव मुस्कुराये। वे जानते थे कि जगतमाता सब जानती हैं। माँ पार्वती और देवों के देव महादेव अदृश्य रूप में वहां पहुंचे जहाँ से रोने की आवाज़ आ रही थी। लड़के के मृत शरीर को देखकर माँ पार्वती तुरंत बोलीं, “हे जगत के स्वामी! ये तो वही सुंदर बालक है जो आपके दिए वरदान से साहूकार के घर में उजाला बन कर आया था। इसका असमय प्राण त्यागना उचित नहीं प्रभु”
भगवन बोले, “इसकी यही नियति थी गौरां। इसकी आयु इतनी ही थी। सो इसने भोग ली।”
माँ पार्वती बोलीं, “हे परमेश्वर! आपकी कृपा के फलस्वरूप जन्में किसी के पुत्र का अधूरी आयु भोगकर मरना उचित नहीं प्रभु। इसे जीवन दीजिये, पूर्णायु दीजिये अन्यथा इसके माता-पिता तड़प तड़प कर मर जायेंगे।”
माँ पार्वती के आग्रह करने पर भोले नाथ ने उस लड़के को जीवित कर दिया। प्रसन्न लड़का और उसका मामा दोनों उसी प्रकार यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन करवाते वापिस अपने घर की ओर चल पड़े। चलते चलते वे उसी नगर में पहुंचे जहाँ उस लड़के का विवाह हुआ था। हवन करवाते एवं ब्राह्मणों को भोजन करवाते समय उस राजा ने उसे पहचान लिया जिसकी बेटी से उसका विवाह हुआ था। वो उन्हें अपने साथ महल में लेकर आया। उनकी खूब सेवा की और खूब सारा धन, दास दसियों सहित अपनी बेटी को उसके साथ विदा कर दिया। जब वे अपने नगर के पास आये तो मामा ने कहा मैं शीघ्र घर पहुँच कर तुम्हारे आने की सूचना दे देता हूँ। जब मामा घर पहुंचा तो देखा साहूकार और उसकी पत्नी छत पर चढ़े हुए थे और उन्होंने प्रण कर रखा था कि यदि उनका पुत्र सकुशल लौट आया तो वे जीवित रहेंगे। अन्यथा छत से कूद कर अपनी जान दे देंगे।
इसके पश्चात् लड़के के मामा ने आकर सूचना दी कि आपका पुत्र सकुशल लौट आया है। शिवभक्त साहूकार और उसकी पत्नी को विश्वास ही नहीं हुआ। लेकिन जब मामा ने शपथपूर्वक उन्हें ये बताया कि आपका पुत्र सकुशल है और एक सुंदर राजकुमारी के साथ विवाह करके खूब सारा धन और दास दासियाँ लेकर लौटा है। तो वे और भी अचंभित हो गए। वे आँखों में आंसू लेकर शिव जी का लाख लाख धन्यवाद् करते हुए नीचे उतरे। वो दौड़ दौड़ कर उनके स्वागत की तैयारियां करने लगे। साहूकार तो भाग भाग कर हर काम कर रहा था और जोर जोर से ‘ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय’ का जप भी किए जा रहा था। उसके पश्चात शिवभक्त साहूकार का परिवार देवों के देव भोलेनाथ की कृपा से ख़ुशी ख़ुशी रहने लगे। माँ पार्वती उन्हें शिवलोक से देख कर प्रसन्न होती थी। जय भोलेनाथ।